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mahabharat 12.280.18: प्रभु! वे जिस प्रकार कर्म में प्रवृत्त होते हैं, जिस कारण से उसमें स्थित रहते हैं और जिस अवस्था में उससे निवृत्त होते हैं, वह मैं तुम्हें क्रमशः बताता हूँ। यहाँ एकाग्रचित्त होकर इसे सुनो॥18॥   |   mahabharat अध्याय 12.280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.280.18 
यथावत् सम्प्रवर्तन्ते यस्मिंस्तिष्ठन्ति वा विभो।
तत् तेऽनुपूर्व्या व्याख्यास्ये तदिहैकमना: शृणु॥ १८॥
 
 
अनुवाद
प्रभु! वे जिस प्रकार कर्म में प्रवृत्त होते हैं, जिस कारण से उसमें स्थित रहते हैं और जिस अवस्था में उससे निवृत्त होते हैं, वह मैं तुम्हें क्रमशः बताता हूँ। यहाँ एकाग्रचित्त होकर इसे सुनो॥18॥
 
'Prabhu! I will tell you step by step the manner in which they engage in action, the reason for which they remain in it, and the state in which they retire from it. Listen to it here with full concentration.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)