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mahabharat 12.280.15-16: ‘वही तिल या सरसों का तेल अनेक सुगन्धित पुष्पों द्वारा बार-बार सूंघने पर अपनी गंध छोड़कर उस पुष्प की गंध में लीन हो जाता है। उसी प्रकार सैकड़ों जन्मों में स्त्री-पुत्रादि के संसर्ग से उत्पन्न सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों के दोषों का समूह बुद्धि और अभ्यासजन्य प्रयत्नों से दूर हो जाता है।॥ 15-16॥   |   mahabharat अध्याय 12.280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  12.280.15-16 
तदेव बहुभिर्माल्यैर्वास्यमानं पुन: पुन:।
विमुञ्चति स्वकं गन्धं माल्यगन्धे च तिष्ठति॥ १५॥
एवं जातिशतैर्युक्तो गुणैरेव प्रसङ्गिषु।
बुद्धॺा निवर्तते दोषो यत्नेनाभ्यासजेन ह॥ १६॥
 
 
अनुवाद
‘वही तिल या सरसों का तेल अनेक सुगन्धित पुष्पों द्वारा बार-बार सूंघने पर अपनी गंध छोड़कर उस पुष्प की गंध में लीन हो जाता है। उसी प्रकार सैकड़ों जन्मों में स्त्री-पुत्रादि के संसर्ग से उत्पन्न सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों के दोषों का समूह बुद्धि और अभ्यासजन्य प्रयत्नों से दूर हो जाता है।॥ 15-16॥
 
‘The same sesame or mustard oil, when repeatedly inhaled by many fragrant flowers, gives up its smell and gets absorbed in the smell of that flower. In the same way, the group of defects generated by the three gunas – Sattva, Raja and Tama – associated with the association of wife and child etc. in hundreds of births can be removed by the efforts born of wisdom and practice.॥ 15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)