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mahabharat 12.280.11-12: जैसे सुनार चाँदी को बार-बार अग्नि में डालकर शुद्ध करता है, वैसे ही जीवात्मा को अपने मन को शुद्ध करने के लिए सैकड़ों जन्म लेने पड़ते हैं; किन्तु यदि वह यज्ञ आदि के द्वारा महान् प्रयत्न करता है और शम-दम आदि कर्म करता है, तो वह एक ही जन्म में शुद्ध हो जाता है॥11-12॥   |   mahabharat अध्याय 12.280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  12.280.11-12 
यथा हिरण्यकर्ता वै रूप्यमग्नौ विशोधयेत्।
बहुशोऽतिप्रयत्नेन महताऽऽत्मकृतेन ह॥ ११॥
तद्वज्जातिशतैर्जीव: शुद्धॺतेऽनेन कर्मणा।
यत्नेन महता चैवाप्येकजातौ विशुद्धॺते॥ १२॥
 
 
अनुवाद
जैसे सुनार चाँदी को बार-बार अग्नि में डालकर शुद्ध करता है, वैसे ही जीवात्मा को अपने मन को शुद्ध करने के लिए सैकड़ों जन्म लेने पड़ते हैं; किन्तु यदि वह यज्ञ आदि के द्वारा महान् प्रयत्न करता है और शम-दम आदि कर्म करता है, तो वह एक ही जन्म में शुद्ध हो जाता है॥11-12॥
 
‘Just as a goldsmith purifies silver by repeatedly putting it into the fire, so a soul takes hundreds of births to purify his mind; but if he makes great efforts through yajnas, etc. and acts like shama-dam, etc., then he becomes pure in a single birth.॥ 11-12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)