श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 28: अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.28.7 
अभिजातोऽस्मि सिद्धोऽस्मि नास्मि केवलमानुष:।
इत्येभिर्हेतुभिस्तस्य त्रिभिश्चित्तं प्रसिच्यते॥ ७॥
 
 
अनुवाद
इससे अहंकार की ये तीन धाराएँ – ‘मैं कुलीन हूँ, मैं सिद्ध हूँ और मैं कोई साधारण मनुष्य नहीं हूँ’ – मनुष्य के मन में सिंचित होने लगती हैं।
 
Due to this, these three streams of ego – ‘I am of noble birth, I am accomplished and I am not an ordinary man’ – begin to irrigate the mind of the man. 7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)