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mahabharat 12.28.57: यदि राजा अपनी प्रजा से नियमित रूप से दान के रूप में धन स्वीकार करता है और राग-द्वेष से रहित होकर राजधर्म का पालन करता है, तो उस धर्मात्मा राजा की कीर्ति समस्त चर-अचर जगत में फैल जाती है ॥57॥   |   mahabharat अध्याय 12.28: अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 28: अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  12.28.57 
समं हि धर्मं चरतो नृपस्य
द्रव्याणि चाभ्याहरतो यथावत्।
प्रवृत्तधर्मस्य यशोऽभिवर्धते
सर्वेषु लोकेषु चराचरेषु॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
यदि राजा अपनी प्रजा से नियमित रूप से दान के रूप में धन स्वीकार करता है और राग-द्वेष से रहित होकर राजधर्म का पालन करता है, तो उस धर्मात्मा राजा की कीर्ति समस्त चर-अचर जगत में फैल जाती है ॥57॥
 
If the king regularly accepts wealth from his subjects in the form of gifts and follows the royal duty without any attachment or aversion, then the fame of that righteous king spreads in all the animate and inanimate worlds. ॥ 57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)