Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.28.55: मनुष्य को चाहिए कि वह पहले पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करे, फिर गृहस्थ जीवन अपनाए, तथा पितृ, देवता और मनुष्य (अतिथि) के ऋण से मुक्त होने के लिए संतान उत्पन्न करे और यज्ञ करे। किसी के प्रति भी नकारात्मक दृष्टि न रखे ॥ 55॥ | mahabharat अध्याय 12.28: अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
चरितब्रह्मचर्यो हि प्रजायेत यजेत च।
पितृदेवमनुष्याणामानृण्यादनसूयक:॥ ५५॥
अनुवाद
मनुष्य को चाहिए कि वह पहले पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करे, फिर गृहस्थ जीवन अपनाए, तथा पितृ, देवता और मनुष्य (अतिथि) के ऋण से मुक्त होने के लिए संतान उत्पन्न करे और यज्ञ करे। किसी के प्रति भी नकारात्मक दृष्टि न रखे ॥ 55॥
A man must first fully observe celibacy and then adopt the life of a householder, and in order to be free from the debts of ancestors, gods and human beings (guests), he must produce children and perform sacrifices. He must not have a negative view towards anyone. ॥ 55॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥