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mahabharat 12.28.46: वे कड़वे काढ़े और अनेक प्रकार के घी पीते हैं, फिर भी जैसे समुद्र अपने किनारों से आगे नहीं बढ़ पाता, वैसे ही वे मृत्यु को पार नहीं कर पाते।   |   mahabharat अध्याय 12.28: अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 28: अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  12.28.46 
ते पिबन्त: कषायांश्च सर्पींषि विविधानि च।
न मृत्युमतिवर्तन्ते वेलामिव महोदधि:॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
वे कड़वे काढ़े और अनेक प्रकार के घी पीते हैं, फिर भी जैसे समुद्र अपने किनारों से आगे नहीं बढ़ पाता, वैसे ही वे मृत्यु को पार नहीं कर पाते।
 
They drink bitter decoctions and various kinds of ghee, yet just as the ocean does not advance beyond its shores, similarly they are unable to cross death.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)