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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 28: अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना
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श्लोक 4
श्लोक
12.28.4
जनक उवाच
आगमे यदि वापाये ज्ञातीनां द्रविणस्य च।
नरेण प्रतिपत्तव्यं कल्याणं कथमिच्छता॥ ४॥
अनुवाद
जनक बोले, 'ब्रह्मन्! जो व्यक्ति अपने कुल और धन का कल्याण चाहता है, उसे सृष्टि या विनाश के विषय में क्या निर्णय लेना चाहिए?'
Janaka said, 'Brahman! What should a person who wants the welfare of his family and wealth decide when it comes to creation or destruction?'
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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