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mahabharat 12.28.27: इस संसार में धनवान मनुष्य भी युवावस्था में ही नष्ट होता हुआ देखा जाता है और दुःखी दरिद्र मनुष्य भी सौ वर्ष तक जीवित रहने के बाद वृद्धावस्था में मरता हुआ देखा जाता है ॥27॥   |   mahabharat अध्याय 12.28: अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 28: अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.28.27 
दृश्यते हि युवैवेह विनश्यन् वसुमान् नर:।
दरिद्रश्च परिक्लिष्ट: शतवर्षो जरान्वित:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में धनवान मनुष्य भी युवावस्था में ही नष्ट होता हुआ देखा जाता है और दुःखी दरिद्र मनुष्य भी सौ वर्ष तक जीवित रहने के बाद वृद्धावस्था में मरता हुआ देखा जाता है ॥27॥
 
In this world, even a rich man is seen perishing in his youth and a poor man in distress is seen dying at a very old age after living for a hundred years. 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)