Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.28.17: हे मनुष्यों के स्वामी! जीवन के प्रारम्भिक, मध्य अथवा अन्तिम काल में कभी न कभी वे दुःख अवश्य ही भोगने पड़ते हैं, जिन्हें मनुष्य विपरीत रूप में चाहता है (अर्थात् वह केवल सुख चाहता है, परन्तु दुःख ही पाता है)।॥17॥ | mahabharat अध्याय 12.28: अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
पूर्वे वयसि मध्ये वाप्युत्तरे वा नराधिप।
अवर्जनीयास्तेऽर्था वै कांक्षिता ये ततोऽन्यथा॥ १७॥
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! जीवन के प्रारम्भिक, मध्य अथवा अन्तिम काल में कभी न कभी वे दुःख अवश्य ही भोगने पड़ते हैं, जिन्हें मनुष्य विपरीत रूप में चाहता है (अर्थात् वह केवल सुख चाहता है, परन्तु दुःख ही पाता है)।॥17॥
O Lord of men! At some point of time in the early, middle or late stages of life, those afflictions are inevitably experienced which a man desires in their opposite form (i.e. he desires nothing but happiness but he ends up getting sufferings as well).॥ 17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥