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mahabharat 12.28.1: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इस प्रकार महर्षि व्यास ने भाइयों के शोक से प्राण त्यागने को उद्यत ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर का शोक दूर किया॥1॥   |   mahabharat अध्याय 12.28: अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 28: अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.28.1 
वैशम्पायन उवाच
ज्ञातिशोकाभितप्तस्य प्राणानभ्युत्सिसृक्षत:।
ज्येष्ठस्य पाण्डुपुत्रस्य व्यास: शोकमपानुदत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इस प्रकार महर्षि व्यास ने भाइयों के शोक से प्राण त्यागने को उद्यत ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर का शोक दूर किया॥1॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! This is how Maharishi Vyas allayed the grief of Yudhishthira, the eldest Pandava who wanted to sacrifice his life due to the grief of his brothers. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)