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mahabharat 12.279.16: वृत्रासुर बोला, "हे ब्रह्मन्! सत्य और तप के बल से मैंने जीवों के आने-जाने का रहस्य निश्चित रूप से जान लिया है; इसलिए मैं इस पर न तो प्रसन्न हूँ और न ही शोक करता हूँ।"   |   mahabharat अध्याय 12.279: ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय तथा उस विषयमें वृत्र-शुक्र-संवादका आरम्भ   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 279: ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय तथा उस विषयमें वृत्र-शुक्र-संवादका आरम्भ  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.279.16 
वृत्र उवाच
सत्येन तपसा चैव विदित्वासंशयं ह्यहम्।
न शोचामि न हृष्यामि भूतानामागतिं गतिम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
वृत्रासुर बोला, "हे ब्रह्मन्! सत्य और तप के बल से मैंने जीवों के आने-जाने का रहस्य निश्चित रूप से जान लिया है; इसलिए मैं इस पर न तो प्रसन्न हूँ और न ही शोक करता हूँ।"
 
Vritraasura said, "O Brahman! By the power of truth and austerity I have definitely understood the secret of the coming and going of the living beings; therefore I neither rejoice nor lament over it."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)