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mahabharat 12.279.13-14: हे मनुष्यों के स्वामी! इस विषय में एक प्राचीन कथा कही जाती है। उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो। भरतनंदन! पूर्वकाल में वृत्रासुर पराजित होकर अपना धन खो बैठा था। उसका कोई सहायक नहीं रह गया था। देवताओं ने उसका राज्य छीन लिया था। उस स्थिति में उस दैत्य ने जो किया, उसका वर्णन इस कथा में है। शत्रुओं के बीच रहते हुए भी उसने आसक्तिरहित मन का आश्रय लेकर शोक नहीं किया।॥13-14॥   |   mahabharat अध्याय 12.279: ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय तथा उस विषयमें वृत्र-शुक्र-संवादका आरम्भ   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 279: ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय तथा उस विषयमें वृत्र-शुक्र-संवादका आरम्भ  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  12.279.13-14 
अस्मिन्नर्थे पुरा गीतं शृणुष्वैकमना नृप।
यथा दैत्येन वृत्रेण भ्रष्टैश्वर्येण चेष्टितम्॥ १३॥
निर्जितेनासहायेन हृतराज्येन भारत।
अशोचता शत्रुमध्ये बुद्धिमास्थाय केवलाम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! इस विषय में एक प्राचीन कथा कही जाती है। उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो। भरतनंदन! पूर्वकाल में वृत्रासुर पराजित होकर अपना धन खो बैठा था। उसका कोई सहायक नहीं रह गया था। देवताओं ने उसका राज्य छीन लिया था। उस स्थिति में उस दैत्य ने जो किया, उसका वर्णन इस कथा में है। शत्रुओं के बीच रहते हुए भी उसने आसक्तिरहित मन का आश्रय लेकर शोक नहीं किया।॥13-14॥
 
O lord of men! An ancient story is told on this subject. Listen to it with full concentration. Bharatanandan! In the past, Vritrasura was defeated and lost his wealth. He had no helper left. The gods had snatched his kingdom. The way that demon did in that condition is described in this story. Even while living in the midst of enemies, he did not grieve, taking shelter of a mind free from attachment.॥ 13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)