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mahabharat 12.277.6: पिता ने कहा - बेटा! द्विज को चाहिए कि पहले ब्रह्मचर्य आश्रम में रहकर वेदों का अध्ययन करे, फिर अपने पितरों के उद्धार के लिए गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करके पुत्र प्राप्ति की कामना करे। वहाँ विधिपूर्वक अग्नि की स्थापना करके उनमें अग्निहोत्र करे। इस प्रकार यज्ञकर्म संपन्न करके वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करके संन्यासी जीवन की कामना करे। 6॥   |   mahabharat अध्याय 12.277: शरीर और संसारकी अनित्यता तथा आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषके कर्तव्यका निर्देश—पिता-पुत्रका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.277.6 
पितोवाच
अधीत्य वेदान् ब्रह्मचर्येषु पुत्र
पुत्रानिच्छेत् पावनाय पितॄणाम्।
अग्नीनाधाय विधिवच्चेष्टयज्ञो
वनं प्रविश्याथ मुनिर्बुभूषेत्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
पिता ने कहा - बेटा! द्विज को चाहिए कि पहले ब्रह्मचर्य आश्रम में रहकर वेदों का अध्ययन करे, फिर अपने पितरों के उद्धार के लिए गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करके पुत्र प्राप्ति की कामना करे। वहाँ विधिपूर्वक अग्नि की स्थापना करके उनमें अग्निहोत्र करे। इस प्रकार यज्ञकर्म संपन्न करके वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करके संन्यासी जीवन की कामना करे। 6॥
 
The father said – Son! A Dwija should first study the Vedas by staying in a celibate ashram, then to save his ancestors, he should enter a Grihastha ashram and wish to have a son. Establish proper fires there and perform Agnihotra in them. After performing the Yajnakarma in this way, he should enter Vanaprastha Ashram and wish to live as a monk. 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)