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mahabharat 12.277.5: पुत्र ने कहा, "पुत्र! मनुष्य का जीवन बहुत तेजी से बीत रहा है। जो धैर्यवान पुरुष इसे अच्छी तरह जानता है, उसे कौन-सा धर्म करना चाहिए? पिताजी! कृपया मुझे यह सब क्रमशः तथा यथार्थ रूप से बताएँ, जिससे मैं भी उस धर्म का पालन कर सकूँ।"   |   mahabharat अध्याय 12.277: शरीर और संसारकी अनित्यता तथा आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषके कर्तव्यका निर्देश—पिता-पुत्रका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 277: शरीर और संसारकी अनित्यता तथा आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषके कर्तव्यका निर्देश—पिता-पुत्रका संवाद  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.277.5 
पुत्र उवाच
धीर: किंस्वित् तात कुर्यात् प्रजानन्
क्षिप्रं ह्यायुर्भ्रश्यते मानवानाम्।
पितस्तथाऽऽख्याहि यथार्थयोगं
ममानुपूर्व्या येन धर्मं चरेयम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
पुत्र ने कहा, "पुत्र! मनुष्य का जीवन बहुत तेजी से बीत रहा है। जो धैर्यवान पुरुष इसे अच्छी तरह जानता है, उसे कौन-सा धर्म करना चाहिए? पिताजी! कृपया मुझे यह सब क्रमशः तथा यथार्थ रूप से बताएँ, जिससे मैं भी उस धर्म का पालन कर सकूँ।"
 
The son said, "Son! The lifespan of human beings is passing by very fast. A patient man who knows this well, which Dharma should he perform? Father! Please tell me all this step by step and in a realistic manner, so that I too can perform that Dharma." 5.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)