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mahabharat 12.277.35-36: इस संसार में ब्रह्मज्ञान के समान कोई नेत्र नहीं है, ब्रह्मज्ञान के समान कोई फल नहीं है, आसक्ति के समान कोई दुःख नहीं है और त्याग के समान कोई सुख नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 12.277: शरीर और संसारकी अनित्यता तथा आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषके कर्तव्यका निर्देश—पिता-पुत्रका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.277.35-36 
नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति विद्यासमं फलम्॥ ३५॥
नास्ति रागसमं दु:खं नास्ति त्यागसमं सुखम्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में ब्रह्मज्ञान के समान कोई नेत्र नहीं है, ब्रह्मज्ञान के समान कोई फल नहीं है, आसक्ति के समान कोई दुःख नहीं है और त्याग के समान कोई सुख नहीं है।
 
In this world there is no eye like the knowledge of Brahman, there is no fruit like the knowledge of Brahman, there is no sorrow like attachment and there is no happiness like renunciation.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)