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mahabharat 12.277.15: सब काम अधूरे रह जाते हैं और मृत्यु हमें अपनी ओर खींचती है; इसलिए मनुष्य को युवावस्था में ही धर्म का आचरण करना चाहिए, क्योंकि जीवन निश्चित नहीं है ॥15॥   |   mahabharat अध्याय 12.277: शरीर और संसारकी अनित्यता तथा आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषके कर्तव्यका निर्देश—पिता-पुत्रका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 277: शरीर और संसारकी अनित्यता तथा आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषके कर्तव्यका निर्देश—पिता-पुत्रका संवाद  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.277.15 
अकृतेष्वेव कार्येषु मृत्युर्वै सम्प्रकर्षति।
युवैव धर्मशील: स्यादनिमित्तं हि जीवितम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
सब काम अधूरे रह जाते हैं और मृत्यु हमें अपनी ओर खींचती है; इसलिए मनुष्य को युवावस्था में ही धर्म का आचरण करना चाहिए, क्योंकि जीवन निश्चित नहीं है ॥15॥
 
All works remain unfinished and death pulls us towards itself; therefore a man must practise Dharma in his youth itself, because life is not certain. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)