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mahabharat 12.277.11: जब प्रत्येक रात के साथ जीवन छोटा होता जा रहा है, तब उथले जल में रहने वाली मछली के समान सुख कौन पा सकता है? 11॥   |   mahabharat अध्याय 12.277: शरीर और संसारकी अनित्यता तथा आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषके कर्तव्यका निर्देश—पिता-पुत्रका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 277: शरीर और संसारकी अनित्यता तथा आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषके कर्तव्यका निर्देश—पिता-पुत्रका संवाद  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.277.11 
रात्र्यां रात्र्यां व्यतीतायामायुरल्पतरं यदा।
गाधोदके मत्स्य इव सुखं विन्देत कस्तदा॥ ११॥
 
 
अनुवाद
जब प्रत्येक रात के साथ जीवन छोटा होता जा रहा है, तब उथले जल में रहने वाली मछली के समान सुख कौन पा सकता है? 11॥
 
When life is becoming shorter and shorter with each passing night, then who can find happiness like a fish living in shallow water? 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)