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mahabharat 12.277.10: जब मैं यह भलीभाँति जानता हूँ कि मृत्यु मेरी आज्ञा से एक क्षण भी नहीं रुक सकती और मैं ज्ञानरूपी कवच ​​से रहित होकर विचरण कर रहा हूँ, तब यह जानकर भी मैं अपने कल्याण के लिए एक क्षण भी कैसे रुकूँगा?॥10॥   |   mahabharat अध्याय 12.277: शरीर और संसारकी अनित्यता तथा आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषके कर्तव्यका निर्देश—पिता-पुत्रका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.277.10 
यदाहमेव जानामि न मृत्युस्तिष्ठतीति ह।
सोऽहं कथं प्रतीक्षिष्ये ज्ञानेनापिहितश्चरन्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जब मैं यह भलीभाँति जानता हूँ कि मृत्यु मेरी आज्ञा से एक क्षण भी नहीं रुक सकती और मैं ज्ञानरूपी कवच ​​से रहित होकर विचरण कर रहा हूँ, तब यह जानकर भी मैं अपने कल्याण के लिए एक क्षण भी कैसे रुकूँगा?॥10॥
 
When I know very well that death cannot wait for even a moment at my command and I am moving about without covering myself with the armour of knowledge, then even after knowing this how will I wait for even a moment in the pursuit of my welfare?॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)