ज्ञानयोग को पुण्य और पाप के नाश का साधन कहा गया है। जब इनके नाश के पश्चात् आत्मा ब्रह्मभाव को प्राप्त होती है, तब विद्वान लोग उसे परम गति मानते हैं। 39.
Gyanyoga is said to be the means for the destruction of virtues and sins. When the soul attains Brahmabhaav after their destruction, then learned people consider it to be the ultimate destination. 39.
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारदासितसंवादे पञ्चसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २७५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारद और असितदेवलका संवादविषयक दो सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७५॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥