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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 275: जीवात्माके देहाभिमानसे मुक्त होनेके विषयमें नारद और असितदेवलका संवाद
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श्लोक 37
श्लोक
12.275.37
नैव संजायते जन्तुर्न च जातु विपद्यते।
याति देहमयं मुक्त्वा कदाचित्परमां गतिम्॥ ३७॥
अनुवाद
आत्मा न तो जन्म लेती है, न मरती है। जब भी उसे सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है, वह देह-अभिमान त्याग देती है और परम मोक्ष को प्राप्त हो जाती है ॥37॥
The soul is neither born nor dies. Whenever it attains the true knowledge, it gives up the body-pride and attains the ultimate salvation. ॥ 37॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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