श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 275: जीवात्माके देहाभिमानसे मुक्त होनेके विषयमें नारद और असितदेवलका संवाद  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  12.275.34 
हित्वा हित्वा ह्ययं प्रैति देहाद् देहं कृताश्रय:।
कालसंचोदित: क्षेत्री विशीर्णाद् वा गृहाद् गृहम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
जैसे एक मकान में रहने वाला मनुष्य पहले मकान के गिर जाने पर दूसरे मकान में चला जाता है, और दूसरे मकान के गिर जाने पर तीसरे मकान में चला जाता है, वैसे ही काल से प्रेरित आत्मा धीरे-धीरे एक शरीर को छोड़कर पूर्व संकल्प से निर्मित दूसरे शरीर में चला जाता है ॥ 34॥
 
Just as a person living in a house goes to another house when the first house collapses, and to a third house when the second collapses, similarly, the soul inspired by time gradually leaves one body and goes to another body created by previous resolution. ॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)