श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 275: जीवात्माके देहाभिमानसे मुक्त होनेके विषयमें नारद और असितदेवलका संवाद  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.275.27 
जन्तुष्वेकतमेष्वेवं भावा ये विधिमास्थिता:।
भावयोरीप्सितं नित्यं प्रत्यक्षं गमनं तयो:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
इनके अतिरिक्त राजस और तामस प्राणियों में से किसी एक श्रेणी के प्राणियों में जो भी भावनाएँ (इच्छाएँ) होती हैं, उनकी स्मृति उन भावनाओं को लीन कर लेती है। अर्थात् जाग्रत और स्वप्न दोनों अवस्थाओं में उन मनुष्यों को अपनी-अपनी प्रवृत्ति के अनुसार राजस और तामस प्राणियों का सदैव प्रत्यक्ष दर्शन होता है॥27॥
 
Apart from these, whatever feelings (desires) are present in any one category of beings, out of the Rajas and Tamas-beings, their memory absorbs those feelings. That is, in both the waking and dream states, those people always have a direct vision of Rajas and Tamas-beings according to their respective inclinations.॥27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)