श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 275: जीवात्माके देहाभिमानसे मुक्त होनेके विषयमें नारद और असितदेवलका संवाद  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.275.17 
पूर्वं चेतयते जन्तुरिन्द्रियैर्विषयान् पृथक्।
विचार्य मनसा पश्चादथ बुद्धॺा व्यवस्यति।
इन्द्रियैरुपलब्धार्थान् बुद्धिमांस्तु व्यवस्यति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जीव पहले इन्द्रियों द्वारा भिन्न-भिन्न विषयों का अनुभव करता है, फिर मन से विचार करके बुद्धि से उनका निश्चय करता है। बुद्धि से युक्त जीव ही इन्द्रियों द्वारा उपलब्ध विषयों का निश्चयपूर्वक अनुभव कर सकता है॥17॥
 
First, a living being perceives different objects through the senses, then after thinking with the mind, he decides about them with the intellect. Only a living being endowed with intellect can definitely experience the objects available through the senses.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)