श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 275: जीवात्माके देहाभिमानसे मुक्त होनेके विषयमें नारद और असितदेवलका संवाद  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.275.15 
रूपं गन्धं रसं स्पर्शं शब्दं चैवाथ तद्‍गुणान्।
इन्द्रियाणि न बुध्यन्ते क्षेत्रज्ञस्तैस्तु बुध्यते॥ १५॥
 
 
अनुवाद
रूप, गंध, रस, स्पर्श और शब्द - ये पाँचों इन्द्रियाँ स्वयं इन्द्रियों को ज्ञात नहीं हैं। केवल क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) ही उन इन्द्रियों के द्वारा इनका अनुभव करता है ॥15॥
 
Form, smell, taste, touch and sound – these five qualities of the senses are not known to the senses themselves. Only the Kshetrapyaan (living soul) experiences them through those senses. 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)