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mahabharat 12.273.7-9h: कुरु नंदन! वह कोई न कोई बहाना लेकर ही अपने कर्तव्यों का पालन करता है, छल-कपट से ही धन कमाने में उसकी रुचि रहती है और यदि छल-कपट से धन प्राप्त करने में सफल हो भी जाए, तो उसमें अपनी सारी बुद्धि लगा देता है। भरत नंदन! फिर विद्वानों और मित्रों के रोकने पर भी वह केवल पाप करना चाहता है और रोकने वालों को धर्म-शास्त्रों के वाक्यों के अनुसार उचित उत्तर देता है। 7-8 1/2।   |   mahabharat अध्याय 12.273: धर्म, अधर्म, वैराग्य और मोक्षके विषयमें युधिष्ठिरके चार प्रश्न और उनका उत्तर   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 273: धर्म, अधर्म, वैराग्य और मोक्षके विषयमें युधिष्ठिरके चार प्रश्न और उनका उत्तर  »  श्लोक 7-9h
 
 
श्लोक  12.273.7-9h 
व्याजेन चरते धर्ममर्थं व्याजेन रोचते।
व्याजेन सिद्धॺमानेषु धनेषु कुरुनन्दन॥ ७॥
तत्रैव कुरुते बुद्धिं तत: पापं चिकीर्षति।
सुहृद्भिर्वार्यमाणोऽपि पण्डितैश्चापि भारत॥ ८॥
उत्तरं न्यायसम्बद्धं ब्रवीति विधिचोदितम्।
 
 
अनुवाद
कुरु नंदन! वह कोई न कोई बहाना लेकर ही अपने कर्तव्यों का पालन करता है, छल-कपट से ही धन कमाने में उसकी रुचि रहती है और यदि छल-कपट से धन प्राप्त करने में सफल हो भी जाए, तो उसमें अपनी सारी बुद्धि लगा देता है। भरत नंदन! फिर विद्वानों और मित्रों के रोकने पर भी वह केवल पाप करना चाहता है और रोकने वालों को धर्म-शास्त्रों के वाक्यों के अनुसार उचित उत्तर देता है। 7-8 1/2।
 
Kuru Nandan! He performs his duties only by taking some excuse, he is interested in earning money only by deceit and if he succeeds in getting money by deceit, then he puts all his intelligence in it. Bharat Nandan! Then even after the scholars and friends stop him, he only wants to commit sins and gives a just answer to those who stop him, as per the sentences of the religious scriptures. 7-8 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)