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mahabharat 12.273.6: लोभ और मोह से घिरे तथा राग-द्वेष के प्रभाव में पड़े मनुष्य में धर्म का पालन करने की बुद्धि नहीं होती। वह किसी न किसी बहाने केवल दिखावे के लिए ही धर्म का आचरण करता है।   |   mahabharat अध्याय 12.273: धर्म, अधर्म, वैराग्य और मोक्षके विषयमें युधिष्ठिरके चार प्रश्न और उनका उत्तर   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 273: धर्म, अधर्म, वैराग्य और मोक्षके विषयमें युधिष्ठिरके चार प्रश्न और उनका उत्तर  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.273.6 
लोभमोहाभिभूतस्य रागद्वेषान्वितस्य च।
न धर्मे जायते बुद्धिर्व्याजाद् धर्मं करोति च॥ ६॥
 
 
अनुवाद
लोभ और मोह से घिरे तथा राग-द्वेष के प्रभाव में पड़े मनुष्य में धर्म का पालन करने की बुद्धि नहीं होती। वह किसी न किसी बहाने केवल दिखावे के लिए ही धर्म का आचरण करता है।
 
A man surrounded by greed and delusion and under the influence of love and hatred does not have the wisdom to follow Dharma. He practices Dharma only for show under some pretext or the other.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)