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mahabharat 12.273.21-22: वह समस्त लोकों को नाशवान मानकर मन से सब कुछ त्यागने का प्रयत्न करता है। तत्पश्चात् वह अयोग्य साधनों से नहीं, अपितु योग्य साधनों से मोक्ष प्राप्ति का प्रयत्न करता है। इस प्रकार जब मनुष्य धीरे-धीरे वैराग्य प्राप्त कर लेता है, तो वह अपने पाप कर्मों का परित्याग कर पुण्यात्मा बन जाता है। तत्पश्चात् उसे परम मोक्ष की प्राप्ति होती है। 21-22॥   |   mahabharat अध्याय 12.273: धर्म, अधर्म, वैराग्य और मोक्षके विषयमें युधिष्ठिरके चार प्रश्न और उनका उत्तर   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 273: धर्म, अधर्म, वैराग्य और मोक्षके विषयमें युधिष्ठिरके चार प्रश्न और उनका उत्तर  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  12.273.21-22 
सर्वत्यागे च यतते दृष्ट्वा लोकं क्षयात्मकम्।
ततो मोक्षाय यतते नानुपायादुपायत:॥ २१॥
शनैर्निर्वेदमादत्ते पापं कर्म जहाति च।
धर्मात्मा चैव भवति मोक्षं च लभते परम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
वह समस्त लोकों को नाशवान मानकर मन से सब कुछ त्यागने का प्रयत्न करता है। तत्पश्चात् वह अयोग्य साधनों से नहीं, अपितु योग्य साधनों से मोक्ष प्राप्ति का प्रयत्न करता है। इस प्रकार जब मनुष्य धीरे-धीरे वैराग्य प्राप्त कर लेता है, तो वह अपने पाप कर्मों का परित्याग कर पुण्यात्मा बन जाता है। तत्पश्चात् उसे परम मोक्ष की प्राप्ति होती है। 21-22॥
 
Considering all the worlds as perishable, he tries to give up everything from his mind. Thereafter, he strives for salvation not through unworthy means but through worthy means. In this way, when a person gradually attains renunciation, he gives up his sinful activities and becomes a virtuous soul. After that one attains ultimate salvation. 21-22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)