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mahabharat 12.273.16: जहाँ कहीं भी वह सद्गुणों को देखता है, वहाँ उनकी जड़ें बढ़ाता है। ऐसा करने से वह पुण्यवान बनता है और उसे हितैषी मित्र प्राप्त होते हैं॥16॥   |   mahabharat अध्याय 12.273: धर्म, अधर्म, वैराग्य और मोक्षके विषयमें युधिष्ठिरके चार प्रश्न और उनका उत्तर   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 273: धर्म, अधर्म, वैराग्य और मोक्षके विषयमें युधिष्ठिरके चार प्रश्न और उनका उत्तर  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.273.16 
तस्यैव सिञ्चते मूलं गुणान् पश्यति तत्र वै।
धर्मात्मा भवति ह्येवं मित्रं च लभते शुभम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
जहाँ कहीं भी वह सद्गुणों को देखता है, वहाँ उनकी जड़ें बढ़ाता है। ऐसा करने से वह पुण्यवान बनता है और उसे हितैषी मित्र प्राप्त होते हैं॥16॥
 
Wherever he sees virtues, he nurtures their roots. By doing so, he becomes virtuous and gains benevolent friends.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)