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mahabharat 12.273.12-13h: इस प्रकार मनुष्य पापी हो जाता है। अब मुझसे पुण्यात्मा के विषय में सुनो। वह जिस प्रकार दूसरों के हितकारी धर्म का आचरण करता है, उसी प्रकार कल्याण का भागी बनता है। हितकारी धर्म के प्रभाव से ही वह अभीष्ट गति को प्राप्त होता है॥12 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.273: धर्म, अधर्म, वैराग्य और मोक्षके विषयमें युधिष्ठिरके चार प्रश्न और उनका उत्तर   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 273: धर्म, अधर्म, वैराग्य और मोक्षके विषयमें युधिष्ठिरके चार प्रश्न और उनका उत्तर  »  श्लोक 12-13h
 
 
श्लोक  12.273.12-13h 
एवं भवति पापात्मा धर्मात्मानं तु मे शृणु।
यथा कुशलधर्मा स कुशलं प्रतिपद्यते॥ १२॥
कुशलेनैव धर्मेण गतिमिष्टां प्रपद्यते।
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मनुष्य पापी हो जाता है। अब मुझसे पुण्यात्मा के विषय में सुनो। वह जिस प्रकार दूसरों के हितकारी धर्म का आचरण करता है, उसी प्रकार कल्याण का भागी बनता है। हितकारी धर्म के प्रभाव से ही वह अभीष्ट गति को प्राप्त होता है॥12 1/2॥
 
In this way a man becomes a sinner. Now listen to me about the virtuous. The way he practices the religion that is beneficial for others, he becomes a part of the welfare in the same way. He attains the desired destination only due to the effect of the beneficial religion.॥12 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)