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mahabharat 12.272.5: हे परंतप युधिष्ठिर! उस ब्राह्मण ने वन में तपस्या द्वारा सिद्धि प्राप्त करके, किसी भी प्राणी की हिंसा न करते हुए, उस यज्ञ का अनुष्ठान किया, जो मूल और फल द्वारा भी स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाला है।॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.272: यज्ञमें हिंसाकी निन्दा और अहिंसाकी प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 272: यज्ञमें हिंसाकी निन्दा और अहिंसाकी प्रशंसा  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.272.5 
उपगम्य वने सिद्धिं सर्वभूताविहिंसया।
अपि मूलफलैरिष्टो यज्ञ: स्वर्ग्य: परंतप॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हे परंतप युधिष्ठिर! उस ब्राह्मण ने वन में तपस्या द्वारा सिद्धि प्राप्त करके, किसी भी प्राणी की हिंसा न करते हुए, उस यज्ञ का अनुष्ठान किया, जो मूल और फल द्वारा भी स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाला है।॥5॥
 
Parantap Yudhishthir! That Brahmin, after attaining perfection through penance in the forest, without doing any violence to any of the living beings, performed the ritual of Yagya which leads to attaining heaven through roots and fruits also. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)