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mahabharat 12.272.4: जहाँ वह रहता था, वहाँ भोजन के लिए केवल सावन (शकरकंद) ही मिलता था। दाल बनाने के लिए सूर्यपर्णी (जंगली काला चना) और शाक के लिए सुवर्चला (ब्राह्मी लता) तथा अन्य प्रकार की कड़वी और स्वादहीन सब्जियाँ ही मिलती थीं; परन्तु ब्राह्मण के तप के कारण उपर्युक्त सभी वस्तुएँ स्वादिष्ट हो गईं॥4॥   |   mahabharat अध्याय 12.272: यज्ञमें हिंसाकी निन्दा और अहिंसाकी प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 272: यज्ञमें हिंसाकी निन्दा और अहिंसाकी प्रशंसा  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.272.4 
श्यामाकमशनं तत्र सूर्यपर्णी सुवर्चला।
तिक्तं च विरसं शाकं तपसा स्वादुतां गतम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जहाँ वह रहता था, वहाँ भोजन के लिए केवल सावन (शकरकंद) ही मिलता था। दाल बनाने के लिए सूर्यपर्णी (जंगली काला चना) और शाक के लिए सुवर्चला (ब्राह्मी लता) तथा अन्य प्रकार की कड़वी और स्वादहीन सब्जियाँ ही मिलती थीं; परन्तु ब्राह्मण के तप के कारण उपर्युक्त सभी वस्तुएँ स्वादिष्ट हो गईं॥4॥
 
Where he lived, only saavan (Indian sweet potato) was available as food. Suryaparni (wild black gram) was available for making dal and Suvarchala (brahmi creeper) and other kinds of bitter and tasteless vegetables were available for vegetables; but due to the penance of the Brahmin, all the above mentioned things became tasty. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)