श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 272: यज्ञमें हिंसाकी निन्दा और अहिंसाकी प्रशंसा  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.272.3 
नारद उवाच
राष्ट्रे धर्मोत्तरे श्रेष्ठे विदर्भेष्वभवद् द्विज:।
उञ्छवृत्तिर्ऋषि: कश्चिद् यज्ञं यष्टुं समादधे॥ ३॥
 
 
अनुवाद
नारदजी बोले- "महान विदर्भ देश में, जहाँ धर्म सर्वोपरि है, एक ब्राह्मण ऋषि रहते थे। वे कटे हुए खेतों या खलिहानों से बिखरे हुए अनाज के दाने इकट्ठा करते और उनसे अपनी जीविका चलाते थे।" एक बार उन्होंने यज्ञ करने का निश्चय किया।
 
Naradji said- A Brahmin sage lived in Vidarbha, a great country where religion is the most important. He used to collect the scattered grains of food grains from the harvested fields or the barn and used to earn his living from them. Once he decided to perform a yajna.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)