श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 272: यज्ञमें हिंसाकी निन्दा और अहिंसाकी प्रशंसा  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.272.20 
अहिंसा सकलो धर्मो हिंसाधर्मस्तथाहित:।
सत्यं तेऽहं प्रवक्ष्यामि यो धर्म: सत्यवादिनाम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
अहिंसा ही पूर्ण धर्म है। हिंसा अधर्म है और अधर्म हानिकारक है। अब मैं तुम्हें सत्य का महत्त्व बताता हूँ, जो सत्यनिष्ठ पुरुषों का परम धर्म है।
 
Non-violence is the complete religion. Violence is adharma and adharma is harmful. Now I will tell you the importance of truth, which is the ultimate religion of truthful men.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि यज्ञनिन्दानाम द्विसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २७२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें हिंसात्मक यज्ञकी निन्दा नामक दो सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७२॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)