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mahabharat 12.272.17: वास्तव में उस मृग के रूप में स्वयं धर्म ही थे, जो मृग का रूप धारण करके अनेक वर्षों से वन में रह रहे थे। प्राणियों की हत्या यज्ञ-विधि के विरुद्ध कार्य है। भगवान धर्म ने उस ब्राह्मण की रक्षा करने का विचार किया॥17॥   |   mahabharat अध्याय 12.272: यज्ञमें हिंसाकी निन्दा और अहिंसाकी प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 272: यज्ञमें हिंसाकी निन्दा और अहिंसाकी प्रशंसा  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.272.17 
स तु धर्मो मृगो भूत्वा बहुवर्षोषितो वने।
तस्य निष्कृतिमाधत्त न त्वसौ यज्ञसंविधि:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वास्तव में उस मृग के रूप में स्वयं धर्म ही थे, जो मृग का रूप धारण करके अनेक वर्षों से वन में रह रहे थे। प्राणियों की हत्या यज्ञ-विधि के विरुद्ध कार्य है। भगवान धर्म ने उस ब्राह्मण की रक्षा करने का विचार किया॥17॥
 
In reality, Dharma himself was in the form of that deer, who had taken the form of a deer and was living in the forest for many years. Killing animals is an act contrary to the rules of Yagya. Lord Dharma thought of saving that Brahmin.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)