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mahabharat 12.271.50-51: भीष्मजी कहते हैं- हे राजन! तब उस धर्मात्मा ब्राह्मण ने भूमि पर सिर टेककर कुण्डधार मेघ को दण्डवत् प्रणाम किया और उससे कहा- 'प्रभु! आपने मुझ पर बड़ी कृपा की है। मैंने पहले काम और लोभ के वशीभूत होकर आपके स्नेह को न समझ पाने के कारण आपके प्रति नकारात्मक दृष्टि रखी थी। कृपया उसके लिए मुझे क्षमा करें।'   |   mahabharat अध्याय 12.271: धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.271.50-51 
भीष्म उवाच
तत: पपात शिरसा ब्राह्मणस्तोयधारिणे।
उवाच चैनं धर्मात्मा महान् मेऽनुग्रह: कृत:॥ ५०॥
कामलोभानुबन्धेन पुरा ते यदसूयितम्।
मया स्नेहमविज्ञाय तत्र मे क्षन्तुमर्हसि॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं- हे राजन! तब उस धर्मात्मा ब्राह्मण ने भूमि पर सिर टेककर कुण्डधार मेघ को दण्डवत् प्रणाम किया और उससे कहा- 'प्रभु! आपने मुझ पर बड़ी कृपा की है। मैंने पहले काम और लोभ के वशीभूत होकर आपके स्नेह को न समझ पाने के कारण आपके प्रति नकारात्मक दृष्टि रखी थी। कृपया उसके लिए मुझे क्षमा करें।'
 
Bhishmaji says- O King! Then that pious Brahmin bowed his head on the ground and prostrated before the Kunddhar Megha and said to him- 'Prabhu! You have bestowed great favour upon me. I had earlier cast a negative view on you because I was bound by lust and greed and did not understand your affection. Please forgive me for that.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)