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mahabharat 12.271.5: तब वह सोचने लगा कि ऐसा कौन सा भगवान है जो मुझ पर इतनी जल्दी प्रसन्न हो जाएगा और जिसकी पूजा करके मनुष्यों ने मुझे जड़ नहीं बना दिया है॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.271: धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 271: धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.271.5 
ततश्चिन्तामनुप्राप्त: कतमद्दैवतं तु तत्।
यन्मे द्रुतं प्रसीदेत मानुषैरजडीकृतम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
तब वह सोचने लगा कि ऐसा कौन सा भगवान है जो मुझ पर इतनी जल्दी प्रसन्न हो जाएगा और जिसकी पूजा करके मनुष्यों ने मुझे जड़ नहीं बना दिया है॥5॥
 
Then he began to think as to which is that God who would be pleased with me so soon and who has not been made inert by humans by worshipping him. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)