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mahabharat 12.271.39: यह विचार आते ही उसका मुख प्रसन्नता से चमक उठा और उसने पुनः बड़े उत्साह से तप आरम्भ कर दिया। पुनः सिद्धि प्राप्त होने पर उसने देखा कि वह जो कुछ भी मन में संकल्प करता है, वह उसके सामने प्रकट हो जाता है, चाहे वह बहुत बड़ा ही क्यों न हो। यह देखकर ब्राह्मण ने पुनः इस प्रकार विचार किया-॥39॥   |   mahabharat अध्याय 12.271: धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 271: धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  12.271.39 
तत: प्रहृष्टवदनो भूय आरब्धवांस्तप:।
भूयश्चाचिन्तयत् सिद्धो यत्परं सोऽभिमन्यते॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
यह विचार आते ही उसका मुख प्रसन्नता से चमक उठा और उसने पुनः बड़े उत्साह से तप आरम्भ कर दिया। पुनः सिद्धि प्राप्त होने पर उसने देखा कि वह जो कुछ भी मन में संकल्प करता है, वह उसके सामने प्रकट हो जाता है, चाहे वह बहुत बड़ा ही क्यों न हो। यह देखकर ब्राह्मण ने पुनः इस प्रकार विचार किया-॥39॥
 
As soon as this thought came, his face lit up with happiness and he started his penance again with great enthusiasm. After attaining siddhi again, he saw that whatever he resolved in his mind, it appeared before him, even if it was very big. Seeing this, the Brahmin again thought like this -॥ 39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)