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mahabharat 12.271.38: उस समय उसे यह ज्ञान हुआ कि यदि मैं संतुष्ट होकर इस संसार में किसी को भी बहुत-सा धन दे दूँ तो मेरा दिया हुआ वचन झूठा नहीं होगा ॥38॥   |   mahabharat अध्याय 12.271: धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 271: धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  12.271.38 
तस्य बुद्धि: प्रादुरासीद् यदि दद्यामहं धनम्।
तुष्ट: कस्यचिदेवेह मिथ्यावाङ् न भवेन्मम॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
उस समय उसे यह ज्ञान हुआ कि यदि मैं संतुष्ट होकर इस संसार में किसी को भी बहुत-सा धन दे दूँ तो मेरा दिया हुआ वचन झूठा नहीं होगा ॥38॥
 
At that time he realized that if, being satisfied, I give a lot of wealth to anybody in this world, then the promise given by me will not be false. ॥ 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)