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mahabharat 12.271.33: भीष्मजी कहते हैं - राजन ! उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने वैराग्य और देवताओं की कृपा से वन में जाकर उस समय घोर तप आरम्भ किया ॥33॥   |   mahabharat अध्याय 12.271: धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 271: धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.271.33 
भीष्म उवाच
निर्वेदाद् देवतानां च प्रसादात् स द्विजोत्तम:।
वनं प्रविश्य सुमहत् तप आरब्धवांस्तदा॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं - राजन ! उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने वैराग्य और देवताओं की कृपा से वन में जाकर उस समय घोर तप आरम्भ किया ॥33॥
 
Bhishmaji says – King! That great Brahmin, going into the forest with renunciation and the blessings of the Gods, began a severe penance at that time. 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)