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mahabharat 12.271.32: ब्राह्मण ने मन ही मन कहा, "जब यह कुण्डधर ही मेरी पुण्य तपस्या का उद्देश्य नहीं समझ सका, तो और कौन समझेगा? अच्छा, अब मैं वन में चला जाऊँगा। यहाँ धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत करना ही श्रेयस्कर है।" 32.   |   mahabharat अध्याय 12.271: धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.271.32 
ब्राह्मण उवाच
अयं न सुकृतं वेत्ति कोन्वन्यो वेत्स्यते कृतम्।
गच्छामि वनमेवाहं वरं धर्मेण जीवितुम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण ने मन ही मन कहा, "जब यह कुण्डधर ही मेरी पुण्य तपस्या का उद्देश्य नहीं समझ सका, तो और कौन समझेगा? अच्छा, अब मैं वन में चला जाऊँगा। यहाँ धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत करना ही श्रेयस्कर है।" 32.
 
The Brahmin said to himself, "When this Kunddhar is unable to understand the purpose of my pious penance, then who else will understand it? Well, now I will go to the forest. It is better to lead a righteous life." 32.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)