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mahabharat 12.271.27: मणिभद्र ने कहा, "धर्म का फल सदैव राज्य और नाना प्रकार के सुख हैं; अतः इस ब्राह्मण को शारीरिक कष्टों से मुक्त होकर उन्हीं फलों का भोग करना चाहिए।"   |   mahabharat अध्याय 12.271: धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 271: धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.271.27 
मणिभद्र उवाच
सदा धर्मफलं राज्यं सुखानि विविधानि च।
फलान्येवायमश्नातु कायक्लेशविवर्जित:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
मणिभद्र ने कहा, "धर्म का फल सदैव राज्य और नाना प्रकार के सुख हैं; अतः इस ब्राह्मण को शारीरिक कष्टों से मुक्त होकर उन्हीं फलों का भोग करना चाहिए।"
 
Manibhadra said, "The fruits of Dharma are always kingdom and various kinds of pleasures; therefore this Brahmin should be free from bodily pains and should enjoy only those fruits." 27.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)