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mahabharat 12.271.22: यह तुम्हारा मित्र ब्राह्मण जितना धन चाहता है, देवताओं की आज्ञा से मैं इसे उतना ही धन अथवा असंख्य धन दे रहा हूँ ॥ 22॥   |   mahabharat अध्याय 12.271: धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 271: धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.271.22 
यावद् धनं प्रार्थयते ब्राह्मणोऽयं सखा तव।
देवानां शासनात् तावदसंख्येयं ददाम्यहम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
यह तुम्हारा मित्र ब्राह्मण जितना धन चाहता है, देवताओं की आज्ञा से मैं इसे उतना ही धन अथवा असंख्य धन दे रहा हूँ ॥ 22॥
 
As much wealth as this Brahmin, your friend, desires, by the order of the gods I am giving him that much wealth or innumerable wealth. ॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)