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mahabharat 12.270.5-6: जो लोग प्राप्त हुई वस्तु को बिना किसी लोभ के त्याग देते हैं, जो कृपणता और ईर्ष्या से रहित हैं, जो यह समझकर सुपात्रों को दान देते हैं कि यही मेरे धन का सर्वोत्तम उपयोग है, जो कभी पापकर्मों का आश्रय नहीं लेते और जो सदैव कर्मयोग के अभ्यास में लगे रहते हैं, उनके मानसिक संकल्प पूर्ण होने लगते हैं और उन्हें शुद्ध ज्ञानस्वरूप परमात्मा में दृढ़ विश्वास हो जाता है ॥5-6॥   |   mahabharat अध्याय 12.270: स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद—चारों आश्रमोंमें उत्तम साधनोंके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिका कथन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 270: स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद—चारों आश्रमोंमें उत्तम साधनोंके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिका कथन  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  12.270.5-6 
उत्पन्नत्यागिनोऽलुब्धा: कृपासूयाविवर्जिता:।
धनानामेष वै पन्थास्तीर्थेषु प्रतिपादनम्॥ ५॥
अनाश्रिता: पापकर्म कदाचित् कर्मयोगिन:।
मन: संकल्पसंसिद्धा विशुद्धज्ञाननिश्चया:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जो लोग प्राप्त हुई वस्तु को बिना किसी लोभ के त्याग देते हैं, जो कृपणता और ईर्ष्या से रहित हैं, जो यह समझकर सुपात्रों को दान देते हैं कि यही मेरे धन का सर्वोत्तम उपयोग है, जो कभी पापकर्मों का आश्रय नहीं लेते और जो सदैव कर्मयोग के अभ्यास में लगे रहते हैं, उनके मानसिक संकल्प पूर्ण होने लगते हैं और उन्हें शुद्ध ज्ञानस्वरूप परमात्मा में दृढ़ विश्वास हो जाता है ॥5-6॥
 
Those who renounce the things they have received without any greed, who are free from miserliness and jealousy, who donate to the deserving with the understanding that this is the best way to use their wealth, who never resort to sinful acts and who are always engaged in the practice of Karmayoga, their mental resolutions start getting fulfilled and they develop a firm faith in the Supreme Being who is the embodiment of pure knowledge. ॥ 5-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)