Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.270.47: उस आकाश के समान, ज्ञानचक्षुओं वाले सभी मनुष्य, जो एक ही अविनाशी और नित्य एकरूप तत्त्व से युक्त हैं, तेज, क्षमा और शांति आदि शुभ साधनों द्वारा उसका साक्षात्कार करते हैं। उन ब्रह्मवेत्ता परमेश्वर को नमस्कार है, जो वास्तव में ब्रह्मवेत्ता से अभिन्न हैं। 47॥   |   mahabharat अध्याय 12.270: स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद—चारों आश्रमोंमें उत्तम साधनोंके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिका कथन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 270: स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद—चारों आश्रमोंमें उत्तम साधनोंके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिका कथन  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  12.270.47 
तेज: क्षमा शान्तिरनामयं शुभं
तथाविधं व्योम सनातनं ध्रुवम्।
एतै: सर्वैर्गम्यते बुद्धिनेत्रै-
स्तस्मै नमो ब्रह्मणे ब्राह्मणाय॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
उस आकाश के समान, ज्ञानचक्षुओं वाले सभी मनुष्य, जो एक ही अविनाशी और नित्य एकरूप तत्त्व से युक्त हैं, तेज, क्षमा और शांति आदि शुभ साधनों द्वारा उसका साक्षात्कार करते हैं। उन ब्रह्मवेत्ता परमेश्वर को नमस्कार है, जो वास्तव में ब्रह्मवेत्ता से अभिन्न हैं। 47॥
 
Like that sky, all people with eyes of knowledge, who have the same, indestructible and always consistent element, encounter it through auspicious means like brightness, forgiveness and peace. Salutations to the Supreme God who is actually inseparable from Brahmavetta. 47॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि गोकपिलीये सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २७०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें गोकपिलीयोपाख्यानविषयक दो सौ सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७०॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)