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mahabharat 12.270.44: सम्पूर्ण शास्त्रों की यही मान्यता है कि जो कुछ भी प्रत्यक्ष है, वह प्रत्यक्ष काल में विद्यमान रहता है, किन्तु परम ज्ञान की अवस्था में जब उसका विखण्डन हो जाता है, तब उसका अस्तित्व नहीं रहता। ज्ञानी पुरुष की दृष्टि में ब्रह्म का सनातन स्वरूप ही इस जगत् का आदि, मध्य और अन्त है। 44॥   |   mahabharat अध्याय 12.270: स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद—चारों आश्रमोंमें उत्तम साधनोंके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिका कथन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 270: स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद—चारों आश्रमोंमें उत्तम साधनोंके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिका कथन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  12.270.44 
एषैव निष्ठा सर्वत्र यत् तदस्ति च नास्ति च।
एतदन्त च मध्यं च सच्चासच्च विजानत:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
सम्पूर्ण शास्त्रों की यही मान्यता है कि जो कुछ भी प्रत्यक्ष है, वह प्रत्यक्ष काल में विद्यमान रहता है, किन्तु परम ज्ञान की अवस्था में जब उसका विखण्डन हो जाता है, तब उसका अस्तित्व नहीं रहता। ज्ञानी पुरुष की दृष्टि में ब्रह्म का सनातन स्वरूप ही इस जगत् का आदि, मध्य और अन्त है। 44॥
 
The only belief of the entire scriptures is that whatever is visible exists in the phenomenal time, but when it is disrupted in the state of ultimate knowledge, it does not exist. In the eyes of a knowledgeable person, the eternal form of Brahma is the beginning, middle and end of this world. 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)