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mahabharat 12.270.36-37: सुमरस्मिनी ने पूछा - हे प्रभु! आप ज्ञान में तत्पर हैं और गृहस्थ लोग कर्म में तत्पर हैं; किन्तु इस समय आप भक्ति में समस्त आश्रमों की एकता का प्रतिपादन कर रहे हैं। इस प्रकार ज्ञान और कर्म की एकता और पृथकता के भ्रम के कारण उनका ठीक-ठीक भेद समझ में नहीं आता। अतः आप मुझे इसे उचित और यथार्थ रीति से समझाने की कृपा करें। ॥36-37॥   |   mahabharat अध्याय 12.270: स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद—चारों आश्रमोंमें उत्तम साधनोंके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिका कथन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 270: स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद—चारों आश्रमोंमें उत्तम साधनोंके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिका कथन  »  श्लोक 36-37
 
 
श्लोक  12.270.36-37 
स्यूमरश्मिरुवाच
भवन्तो ज्ञाननिष्ठा वै गृहस्था: कर्मनिश्चया:।
आश्रमाणां च सर्वेषां निष्ठायामैक्यमुच्यते॥ ३६॥
एकत्वेन पृथक्त्वेन विशेषो नात्र दृश्यते।
तद् यथावद् यथान्यायं भगवान् प्रब्रवीतु मे॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
सुमरस्मिनी ने पूछा - हे प्रभु! आप ज्ञान में तत्पर हैं और गृहस्थ लोग कर्म में तत्पर हैं; किन्तु इस समय आप भक्ति में समस्त आश्रमों की एकता का प्रतिपादन कर रहे हैं। इस प्रकार ज्ञान और कर्म की एकता और पृथकता के भ्रम के कारण उनका ठीक-ठीक भेद समझ में नहीं आता। अतः आप मुझे इसे उचित और यथार्थ रीति से समझाने की कृपा करें। ॥36-37॥
 
Sumarasmini asked - O Lord! You are devoted to knowledge and householders are devoted to action; but at this time you are propounding the unity of all the ashramas in devotion. In this way, due to the confusion of the unity and separation of knowledge and action, the exact difference between them is not understood. Therefore, please explain it to me in a proper and true manner. ॥36-37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)