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mahabharat 12.270.18: उसके उत्तम कार्यों की बहुत प्रशंसा हुई। वह स्वभाव से शुद्धचित्त, सरल, शांतिप्रिय और आत्मनिष्ठ था ॥18॥   |   mahabharat अध्याय 12.270: स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद—चारों आश्रमोंमें उत्तम साधनोंके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिका कथन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 270: स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद—चारों आश्रमोंमें उत्तम साधनोंके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिका कथन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.270.18 
स्वकर्मभि: शंसितानां प्रकृत्या शंसितात्मनाम्।
ऋजूनां शमनित्यानां स्वेषु कर्मसु वर्तताम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
उसके उत्तम कार्यों की बहुत प्रशंसा हुई। वह स्वभाव से शुद्धचित्त, सरल, शांतिप्रिय और आत्मनिष्ठ था ॥18॥
 
He was highly praised for his excellent deeds. By nature he was pure minded, simple, peace loving and self-righteous. 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)