अध्याय 270: स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद—चारों आश्रमोंमें उत्तम साधनोंके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिका कथन
श्लोक 1: कपिल बोले - सुमेरश्मे! वेद सम्पूर्ण जगत के लिए प्रमाण हैं। अतः वेदों की अवहेलना नहीं की गई है। ब्रह्म के दो रूप समझने चाहिए - शब्दब्रह्म (वेद) और परब्रह्म (सच्चिदानन्दघन परमात्मा)। 1॥
श्लोक 2-3: शब्द ब्रह्म में पारंगत (वैदिक अनुष्ठानों से जिसका मन शुद्ध हो गया है) मनुष्य परब्रह्म को प्राप्त करता है। माता-पिता जिस शिशु को जन्म देते हैं, उसके शरीर पर वैदिक अनुष्ठानों द्वारा अनुष्ठान करते हैं। इस प्रकार, जिसका शरीर वैदिक अनुष्ठानों से शुद्ध हो जाता है, वही ब्रह्मज्ञान का अधिकारी होता है। अब मैं तुम्हें अपनी बुद्धि के अनुसार बता रहा हूँ कि किस प्रकार कर्म ही शाश्वत मोक्ष-आनंद की प्राप्ति का कारण हैं।
श्लोक 4: जो मनुष्य भोग की इच्छा न रखते हुए अपना कर्तव्य समझकर यज्ञ करते हैं, उनके यज्ञ का फल वेद या इतिहास से ज्ञात नहीं होता, वह प्रत्यक्ष है और उसे सब लोग अपनी आँखों से देख सकते हैं ॥4॥
श्लोक 5-6: जो लोग प्राप्त हुई वस्तु को बिना किसी लोभ के त्याग देते हैं, जो कृपणता और ईर्ष्या से रहित हैं, जो यह समझकर सुपात्रों को दान देते हैं कि यही मेरे धन का सर्वोत्तम उपयोग है, जो कभी पापकर्मों का आश्रय नहीं लेते और जो सदैव कर्मयोग के अभ्यास में लगे रहते हैं, उनके मानसिक संकल्प पूर्ण होने लगते हैं और उन्हें शुद्ध ज्ञानस्वरूप परमात्मा में दृढ़ विश्वास हो जाता है ॥5-6॥
श्लोक 7: वे किसी पर क्रोध नहीं करते, किसी पर कुदृष्टि नहीं रखते, अहंकार और स्वार्थ से दूर रहते हैं, ज्ञान के साधनों में उनकी भक्ति होती है, उनका जन्म, कर्म और ज्ञान- तीनों ही शुद्ध होते हैं और वे समस्त प्राणियों के हित के लिए तत्पर रहते हैं॥7॥
श्लोक 8: पूर्वकाल में ऐसे बहुत से ब्राह्मण और राजा हुए हैं, जो गृहस्थ आश्रम में रहते हुए भी अपने-अपने कर्तव्यों का परित्याग नहीं करते थे, अपितु निष्काम भाव से नियमानुसार उनमें लगे रहते थे ॥8॥
श्लोक 9: वे सब प्राणियों को समान दृष्टि से देखते थे। वे सरल, संतोषी, ज्ञानी, प्रत्यक्ष फल देने वाले धर्म के अनुयायी, शुद्ध बुद्धि वाले तथा शब्दब्रह्म और परब्रह्म दोनों में श्रद्धा रखने वाले थे।
श्लोक 10-11: वे पहले आवश्यक नियमों का पालन करके अपने मन को शुद्ध करते थे और जब उन्हें कठिनाइयाँ और दुर्गम स्थान मिलते थे, तब भी वे एक साथ मिलकर धार्मिक अनुष्ठान करने में तत्पर रहते थे। जो पूर्व पुरुष समूह में धार्मिक अनुष्ठान करते थे, उन्हें उसमें सुख का अनुभव होता था। उन्हें किसी प्रकार का प्रायश्चित नहीं करना पड़ता था।॥10-11॥
श्लोक 12: वे सत्यधर्म का आश्रय लेने के कारण ही अत्यन्त साहसी माने जाते थे। वे किंचितमात्र भी पाप नहीं करते थे और मृत्यु का सामना होने पर भी धर्म के विषय में छल नहीं करते थे। 12॥
श्लोक 13: वे सब लोग एक साथ रहते थे और उत्तम कोटि का धर्म मानते थे; इसलिए उन्हें कभी तपस्या करने का अवसर नहीं मिला ॥13॥
श्लोक 14: जो शुद्ध हृदय वाले मनुष्य उस परम धर्म में स्थित हैं, उनके लिए कोई प्रायश्चित नहीं है। ऐसा सुना जाता है कि दुर्बल हृदय वाले ही पाप करते हैं और प्रायश्चित उन्हीं के लिए निर्धारित किया गया है॥14॥
श्लोक 15: इस प्रकार पूर्वकाल में बहुत से ब्राह्मण यज्ञ करते थे। वे वेदों के ज्ञान में निपुण, पवित्र, गुणवान और प्रसिद्ध थे॥15॥
श्लोक 16: वे विद्वान पुरुष कामनाओं के बंधन से मुक्त होकर प्रतिदिन भगवान को हवि अर्पित करते थे। उनके यज्ञ, वेद-अध्ययन तथा अन्य अनुष्ठान शास्त्रानुसार सम्पन्न होते थे। 16॥
श्लोक 17: उन्होंने काम और क्रोध का त्याग कर दिया था। उनका आचरण और कर्म दूसरों के लिए अनुकरणीय नहीं थे। समय के साथ उनके हृदय में शास्त्रों का ज्ञान और शुभ भावनाएँ धीरे-धीरे उत्पन्न होने लगीं॥17॥
श्लोक 18: उसके उत्तम कार्यों की बहुत प्रशंसा हुई। वह स्वभाव से शुद्धचित्त, सरल, शांतिप्रिय और आत्मनिष्ठ था ॥18॥
श्लोक 19: उनका हृदय अत्यंत उदार था, उनका आचरण और कर्म दूसरों के लिए अनुकरणीय नहीं थे, इसलिए उनके सभी पुण्य कर्म अनंत मोक्ष के रूप में फलित हुए। ऐसा हम सदैव सुनते आए हैं।
श्लोक 20: वे अपने ही कर्मों से समृद्ध थे। उनकी तपस्या ने कठोर रूप धारण कर लिया था। उन्होंने अद्भुत नैतिक आचरण अपनाया और उसका फल उन्हें प्राचीन, सनातन और अविनाशी ब्रह्म के रूप में प्राप्त हुआ।
श्लोक 21: बहुत से लोग धर्मों की सूक्ष्मताओं का पालन करने में असमर्थ हो जाते हैं। वास्तव में वेदविहित आचरण और धर्म आपत्तियों से रहित है। उसमें न तो प्रमाद है और न ही असफलता॥ 21॥
श्लोक 22: पूर्वकाल में जब सब वर्णों की सृष्टि हुई, तब आश्रम के विषय में कोई भेद नहीं था। तत्पश्चात् वही आश्रम आयु के आधार पर चार भागों में विभक्त हो गया। यह बात सभी ब्राह्मण जानते थे॥ 22॥
श्लोक 23-25: श्रेष्ठ पुरुष उन सब आश्रमों में नियमपूर्वक प्रवेश करते हैं और अपने धर्म का पालन करते हुए परम गति को प्राप्त होते हैं। उनमें से कुछ लोग घर छोड़कर (अर्थात् संन्यासी बनकर), कुछ लोग वानप्रस्थ का आश्रय लेकर, कुछ लोग गृहस्थ जीवन बिताकर और कुछ लोग उस आश्रम के धर्म का पालन करते हुए परम गति को प्राप्त होते हैं। उस समय वे ही ब्राह्मण आकाश में प्रकाशमान होकर दिखाई देते हैं, जो नक्षत्रों के समान हैं, आकाश में जगह-जगह बहुत से तारे हैं - वे सब लोग संतोष से ही इस शाश्वत गति को प्राप्त हुए हैं, यह वैदिक सिद्धांत है।।23-25।।
श्लोक 26: ऐसा पुण्यात्मा पुरुष यदि पुनः कभी कर्मों से युक्त संसार में आता है या जन्म लेता है, तो उस संसार के सम्बन्ध के कारण वह पापकर्मों में लिप्त नहीं होता ॥26॥
श्लोक 27: इसी प्रकार जो ब्रह्मचारी सदैव गुरु की सेवा में तत्पर रहता है, ब्रह्मचर्य परायण है, दृढ़ निश्चयी है और योगयुक्त है, वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है। उसके अतिरिक्त अन्य प्रकार के ब्राह्मण निम्न श्रेणी के या नाममात्र के ब्राह्मण माने जाते हैं। 27॥
श्लोक 28-29: इस प्रकार शुभ या अशुभ कर्म ही मनुष्य के तद्नुरूप नाम का निर्धारण करते हैं। जिनके राग-द्वेष आदि परिपक्व हो गए हैं, जिनकी कामनाएँ मन से निकल गई हैं, जो भीतर-बाहर से शुद्ध हैं और जिनकी बुद्धि कल्याणरूप मोक्ष में ही केन्द्रित है, उन तत्वदर्शी पुरुषों की दृष्टि में अनन्त ब्रह्मज्ञान और शास्त्रज्ञान के प्रभाव से सब कुछ ब्रह्मस्वरूप हो गया था; ऐसा हम सदा सुनते आए हैं॥28-29॥
श्लोक 30: तुरीय ब्रह्म से संबंधित उपनिषद्-विद्या, उसकी प्राप्ति में सहायक संयम, त्याग, धैर्य, श्रद्धा और संकल्प रूपी धर्म सभी वर्णों और आश्रमों के लोगों के लिए समान है - ऐसा स्मृति का कथन है। परंतु केवल अनुशासित, तपस्वी और ब्रह्मनिष्ठ ही उस धर्म का सदैव पालन करने में समर्थ हैं।
श्लोक 31: जिसका सुख संतोष पर आधारित है, जिसका स्वभाव त्याग है, जो ज्ञान का धाम कहा गया है, जिसमें मोक्ष देने वाली बुद्धि और ब्रह्म साक्षात्कार की वृत्ति सदैव आवश्यक है, वह संन्यास आश्रम रूपी धर्म शाश्वत है।
श्लोक 32: यह तप चाहे अन्य आश्रमों के धर्मों से मिश्रित हो अथवा स्वतंत्र, जो अपनी वैराग्य शक्ति के अनुसार इसका आश्रय लेते हैं, उनका कल्याण होता है। इस मार्ग पर चलने वाले सभी यात्री परम कल्याण को प्राप्त होते हैं; किन्तु जो दुर्बल है, जो मन और इन्द्रियों को वश में न कर पाने के कारण इसका अभ्यास नहीं कर पाता, वह यहाँ विश्रामपूर्वक बैठता है। जो बाहर और भीतर से शुद्ध है, वह ब्रह्मपद का अनुसंधान करके संसार के बंधन से मुक्त हो जाता है। 32।
श्लोक 33-34: सुमरस्मिनि ने पूछा - "ब्राह्मण! जो लोग केवल अपने द्वारा अर्जित धन का उपभोग करते हैं, जो दान देते हैं, जो उसे यज्ञों में लगाते हैं, जो स्वयं अध्ययन करते हैं या जो संन्यास मार्ग अपनाते हैं, इनमें से कौन पुरुष मृत्यु के बाद स्वर्ग को जीतता है? मैं जिज्ञासावश यह पूछ रही हूँ; कृपया मुझे यह सब विस्तारपूर्वक बताइये।" 33-34
श्लोक 35: कपिलजी बोले - सात्विक गुण से उत्पन्न सभी सम्पत्तियाँ शुभ हैं; किन्तु इनमें से कोई भी त्याग में मिलने वाले सुख को प्राप्त नहीं कर सकती। तुम भी इसे देखो। 35.
श्लोक 36-37: सुमरस्मिनी ने पूछा - हे प्रभु! आप ज्ञान में तत्पर हैं और गृहस्थ लोग कर्म में तत्पर हैं; किन्तु इस समय आप भक्ति में समस्त आश्रमों की एकता का प्रतिपादन कर रहे हैं। इस प्रकार ज्ञान और कर्म की एकता और पृथकता के भ्रम के कारण उनका ठीक-ठीक भेद समझ में नहीं आता। अतः आप मुझे इसे उचित और यथार्थ रीति से समझाने की कृपा करें। ॥36-37॥
श्लोक 38: कपिलजी बोले - कर्म स्थूल और सूक्ष्म शरीर को शुद्ध करता है, किन्तु ज्ञान ही परम मोक्ष है। जब कर्म द्वारा मन के आसक्ति आदि दोष जल जाते हैं, तब मनुष्य ज्ञान में स्थित हो जाता है, जो आनंद का सार है ॥38॥
श्लोक 39-40: सभी जीवों पर दया, क्षमा, शांति, अहिंसा, सत्य, सरलता, विद्रोह, निर्लज्जता, लज्जा, तितिक्षा और लज्जा - ये परब्रह्म प्राप्ति के मार्ग हैं। इनके द्वारा मनुष्य परब्रह्म को प्राप्त होता है। इस प्रकार विद्वान पुरुष को चाहिए कि वह अपने मन से अपने कर्मों के वास्तविक फल को समझे। 39-40॥
श्लोक 41: जिस गति से विप्र सब ओर से शान्त, संतुष्ट, शुद्ध मन और ज्ञान को प्राप्त करता है, उसे परमगति कहते हैं ॥41॥
श्लोक 42: जो वेदों को तथा उनके द्वारा जाने जाने वाले परब्रह्म को जानता है, वह वेदवेत्ता कहलाता है। उसके अतिरिक्त अन्य लोग अपने मुख से वेदों का उच्चारण नहीं करते, वे केवल धौंकनी के समान वायु फूँकते हैं॥ 42॥
श्लोक 43: वेदों का ज्ञान रखने वाला मनुष्य सभी विषयों को जानता है, क्योंकि सब कुछ वेदों में स्थापित है। जो वस्तुएँ हैं और जो नहीं हैं, उन सबकी स्थिति वेदों में बताई गई है। ॥43॥
श्लोक 44: सम्पूर्ण शास्त्रों की यही मान्यता है कि जो कुछ भी प्रत्यक्ष है, वह प्रत्यक्ष काल में विद्यमान रहता है, किन्तु परम ज्ञान की अवस्था में जब उसका विखण्डन हो जाता है, तब उसका अस्तित्व नहीं रहता। ज्ञानी पुरुष की दृष्टि में ब्रह्म का सनातन स्वरूप ही इस जगत् का आदि, मध्य और अन्त है। 44॥
श्लोक 45: सब कुछ त्यागने पर ही मनुष्य उस ब्रह्म को प्राप्त कर सकता है। इसकी पुष्टि सभी वेदों में की गई है। वह अपने आनंदमय स्वभाव से सबमें आसक्त होकर मोक्ष में स्थित होता है॥ 45॥
श्लोक 46: अतः वह ब्रह्म सनातन, सत्य, ज्ञात, अज्ञेय, सबका आत्मा, स्थावर और जंगम स्वरूप, पूर्ण सुखस्वरूप, शुभ, श्रेष्ठ, अव्यक्त, सबकी उत्पत्ति का कारण और अविनाशी है ॥46॥
श्लोक 47: उस आकाश के समान, ज्ञानचक्षुओं वाले सभी मनुष्य, जो एक ही अविनाशी और नित्य एकरूप तत्त्व से युक्त हैं, तेज, क्षमा और शांति आदि शुभ साधनों द्वारा उसका साक्षात्कार करते हैं। उन ब्रह्मवेत्ता परमेश्वर को नमस्कार है, जो वास्तव में ब्रह्मवेत्ता से अभिन्न हैं। 47॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥