श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 27: युधिष्ठिरको शोकवश शरीर त्याग देनेके लिये उद्यत देख व्यासजीका उन्हें उससे निवारण करके समझाना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.27.33 
यथा सृष्टोऽसि कौन्तेय धात्रा कर्मसु तत् कुरु।
अत एव हि सिद्धिस्ते नेशस्त्वं कर्मणां नृप॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीनन्दन! नरेश्वर! विधाता ने आपके लिए जो कर्म बनाए हैं, उनका अनुष्ठान आपको करना चाहिए। उन्हीं से आपको सफलता मिलेगी। आप अपने कर्मों के स्वामी या नियन्ता नहीं हैं। 33॥
 
Kuntinandan! Nareshwar! You should perform the rituals for the actions that the Creator has created for you. Only through them will you attain success. You are not the master or controller of your actions. 33॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि व्यासवाक्ये सप्तविंशोऽध्याय:॥ २७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें व्यासवाक्यविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)